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Reading: यज्ञ करने वाले ‘भगत’ भील, गोविंद गुरु और अंग्रेजों ने मानगढ़ में किया नरसंहार News To Nation
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Home » यज्ञ करने वाले ‘भगत’ भील, गोविंद गुरु और अंग्रेजों ने मानगढ़ में किया नरसंहार News To Nation

भारत की बात

यज्ञ करने वाले ‘भगत’ भील, गोविंद गुरु और अंग्रेजों ने मानगढ़ में किया नरसंहार News To Nation

NTN Staff
2 years ago
13 Min Read
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सामान्य रूप से जब भारत के स्वतंत्रता संग्राम एवं उस दौरान हुए बलिदानों की बात होती है तब सबसे पहले हमें जलियाँवाला बाग़ याद आता है। वैसे तो किसी भी एक हत्याकांड की तुलना दूसरे हत्याकांड से नहीं हो सकती किन्तु तथ्य है कि गुजरात और राजस्थान की सीमा पर स्थित मानगढ़ पहाड़ी पर हुआ आदिवासी भीलों का नरसंहार जलियाँवाला बाग़ से कई गुना बड़ा नरसंहार था। फिर भी राष्ट्रीय स्तर पर इस इतिहास से लोग अभी तक अनभिज्ञ हैं।  

सबसे पहले मानगढ़ पहाड़ी के बारे में जानते हैं। मानगढ़, अरावली पर्वत श्रृंखला की ही एक पहाड़ी है जिसका एक भाग गुजरात के दाहोद जिले में है और दूसरा भाग राजस्थान के बाँसवाड़ा में है। कहा जाता है कि प्राचीन समय में इस पहाड़ी के नीचे अनेकों गुफाएँ थी जहाँ साधु-महात्मा तप किया करते थे। कभी यहाँ आसपास के क्षेत्रों में भील-जनजातीय समाज का साम्राज्य था। मध्यकाल में इसी पहाड़ी पर मानसिंह भील का दबदबा रहा जिसके नाम पर से ही आगे इस पहाड़ी को ‘मानगढ़’ कहा जाने लगा।

17 नवम्बर, 1913 की रोज इस पहाड़ी के आसपास के सभी भील-जनजातीय समाज ने गोविंद गुरु के नेतृत्व में अंग्रेजों से लोहा लिया। लगभग डेढ़ लाख की संख्या में स्थानीय भील-जनजातीय समाज इस पहाड़ी पर इकट्ठा हो गए। तभी अंग्रेजों ने इस पहाड़ी को चारों ओर से घेर कर सभी निहत्थे लोगों को अपनी बंदूकों की गोलियों से भून डाला। सरकारी रिकॉर्ड्स कहते हैं उस नरसंहार में 1500 से 2000 लोगों की हत्याएँ हुई थीं लेकिन यह असल आँकड़ा कितना बड़ा रहा होगा उसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।

आज आसपास के सनातनियों के लिए यह पहाड़ी किसी तीर्थ स्थान से कम नहीं है। इसलिए अब इसे ‘मानगढ़ धाम’ के रूप में जाना जाता है। प्रतिवर्ष मागषर पूर्णिमा के दिन यहाँ बड़ी संख्या में सनातनी इकट्ठा होते हैं और गोविंद गुरु एवं अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। जहाँ तक गोविंद गुरु की बात है, उनका जन्म ईस्वी 1863 में डूंगरपुर के वाँसिया गाँव में हुआ था। वे बाल्यकाल से ही भक्तिभाव वाले व्यक्ति थे। वे अपने गाँव में जनजातीय समाज के बच्चों को इकट्ठा कर के यहाँ की वागड़ी भाषा में भगवान की कहानियाँ सुनाया करते थे। 

वे जाति से बंजारा थे लेकिन बगैर किसी भेद-भाव के जनजातीय समाज-भील बच्चों के साथ ही खेलते-कूदते, खाते-पीते थे, इसी कारण जनजातीय समाज के लोग भी उन्हें बहुत ही सम्मान देते थे।गोविंद गुरु जब 18 वर्ष के हुए तब उनके जीवन में एक बहुत बड़ी घटना घटी। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में स्वामी दयानंद सरस्वती अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध हो चुके थे। 1881 में जब वे उदयपुर के महाराणा से मिलने पहुँचे तो उन्होंने सर्वप्रथम गोविंद गुरु से मिलने की इच्छा व्यक्त की। 

स्वामीजी ने गोविंद गुरु के आंतरिक परिबलों की गहराई नापते हुए उन्हें और उनकी पत्नी को उच्च कक्षा का ज्ञान देकर उन्हें दीक्षित किया, जिसके बाद गोविंद गुरु के जीवन में एक बहुत बड़ा क्रन्तिकारी बदलाव आया।  स्वामी दयानन्द सरस्वती से हुई उस भेंट के पश्चात, गोविंद गुरु ने आध्यात्मिकता के आधार पर आदिवासी-भीलों का उत्थान करने के उद्देश्य से भगत सम्प्रदाय की स्थापना की। 

भगत पंथ, मूल रूप से वैदिक विचारों का पालन करने का आग्रह करता था जिसमें यज्ञकुंड में नारियल का हवन कर के असत्य नहीं बोलने, चोरी नहीं करने, मदिरा-मांस का सेवन नहीं करने, जीव हत्या नहीं करने जैसी प्रतिज्ञाएँ ली जाती थी। जो व्यक्ति इन नियमों का पालन करता उन्हें गोविंद गुरु ‘भगत’ के नाम से पुकारते थे। गोविंद गुरु स्वयं निरक्षर थे किन्तु वे अपने भगत परिवारों से आग्रह रखते कि वे सभी सुशिक्षित एवं संस्कारी बने ताकि समाज में वे प्रगति कर सकें। 

भगत सम्प्रदाय की स्थापना के कुछ ही वर्षों में असंख्य जनजातीय समाज-भील, गोविंद गुरु के शिष्य बन गए। उनका प्रभाव गुजरात, राजस्थान एवं मध्यप्रदेश के आसपास के सभी गाँवों में फैलने लगा। तब इतने बड़े स्तर के कार्य को व्यवस्थित दिशा देने के लिए उन्होंने 1905 में संप सभा की स्थापना की जिसका कार्य गांव स्तर पर उनके शिष्यों को विविध जिम्मेदारियाँ देकर सम्पूर्ण समाज का उत्थान करना था।

उन्होंने अपने संगठन को दो कार्यों में विभाजित कर दिया। पहला कार्य जनजातीय-भील समाज के संरक्षण के लिए सेना तैयार करना था जिसकी तमाम जिम्मेदारी पारगी पूंजाभाई को दी गई। और, दूसरा काम धर्म का प्रचार करना था जिसमें पूजा-पाठ के लिए कुरिया भगत, पशुपालन के लिए जयंतीभाई भगत, आत्मा की शांति के लिए वालभाई भगत, हवन के लिए लेम्बाभाई भगत, कुवें खोदने के लिए कलजीभाई भगत, प्रचार के लिए जोरजीभाई भगत, पर्यावरण एवं वन रक्षण के लिए थावरा भगत एवं शिक्षा के लिए भलजीभाई पारगी इत्यादि को जिम्मेदारियाँ दी गईं। 

विक्रम संवत 1956, यानी ईस्वी सन 1899 में भारत एक गंभीर काल का भोग बना जिसे आम भाषा में हम ‘छपनिया अकाल’ के रूप में जानते हैं। अकालों के इतिहास में ‘छपनिये अकाल’ जैसा कोई अकाल नहीं है। अन्न, पानी एवं घासचारे के अभाव में मानव, पशु, पक्षी सभी मृत्यु को प्राप्त हो रहे थे। किसान जिन पशुओं को अपनी संतानों की तरह प्रेम करते थे, उस काल में मानव उन मृत पशु-संतानों का मांस खाकर भी जीवित रहने की लड़ाई लड़ रहा था।

उसी दौरान गोविंद गुरु की पत्नी एवं उनके दोनों पुत्र भी काल के कोप में समा गए। लेकिन, गोविंद गुरु ने उस विष को भी कंठ में समेट लिया और लोगों के घर-घर पहुँच कर यथासंभव सहायता कर रहे थे। यह देखकर एक ओर सभी सनातनी गोविंद गुरु का जय-जय कार कर रहे थे वहीं दूसरी ओर अंग्रेजों एवं ईसाई मिशनरियों को गोविंद गुरु का बढ़ता कद एवं उनका आंदोलन रास नही आ रहा था। 

मध्यप्रदेश के थांदला गाँव में धर्मांतरण का रैकेट चलाने वाले एक फ्रेंच पादरी ने अंग्रेज शासकों को एक पत्र लिखकर गोविंद गुरु से सतर्क रहने की चेतावनी दी। इसके बाद अंग्रेजों ने तुरंत कार्यवाही करते हुए गोविंद गुरु एवं पुंजाभाई पारगी को बंदी बना लेने की योजना बनाई। दूसरी ओर अब गोविंद गुरु के शिष्य उनको एक भी क्षण अकेला छोड़ने को तैयार नहीं थे। सभी शिष्य हमेशा ही खुली तलवारें लेकर उनके आसपास ही रहते थे। 

इसी दौरान, 31 अक्टूबर, 1913 को पुंजाभाई पारगी एवं उनके साथियों ने गडरा पुलिस स्टेशन के फौजदार की हत्या कर दी और कॉन्स्टेबल को बंदी बनाकर मानगढ़ ले आये। फौजदार की मौत के बाद अंग्रेज एवं जनजातीय समाज-भील एक दूसरे के आमने-सामने आ गए। 

गोविंद गुरु द्वारा कुछ समझौते के कुछ प्रयास हुए किन्तु तब तक पानी सर से ऊपर जा चुका था। अंग्रेज, भगतों को जबरदस्ती बंदी बना रहे थे, उन्हें शराब पिला रहे थे तथा यज्ञ कुंडों पर पशुओं की हत्या कर के उसे अपवित्र कर रहे थे। कहा जाता है कि सबसे अधिक तनाव तब बढ़ गया जब अंग्रेजों ने मानगढ़ में सबसे बड़े यज्ञ कुंड को अपवित्र करने के लिए एक नकली साधु को श्रीफल में गाय का खून भरकर भेजा और वह ऐसा करने में सफल भी हो गया।

6 नवंबर, 1913 की रोज माहि डिवीज़न के जनरल ऑफिसर कमांडर ने चीफ जनरल स्टाफ को सूचना दी कि गोविंद गुरु के नेतृत्व में आदिवासी-भील मानगढ़ पर एकत्रित होकर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध विद्रोह की तैयारी कर रहे हैं। चीफ जनरल उस पर तुरंत एक्शन लेते हुए दिनांक 12 नवंबर, 1913 को माही, वडोदरा, अमदावाद और खेरवाड़ा के सैनिकों को लड़ाई के तैयार रहने के आदेश दिए। और 104 रायफल की एक कंपनी को मानगढ़ के लिए रवाना किया गया। 

16 नवम्बर, 1913 की शाम तक अंग्रेज सिपाहियों ने पूरी मानगढ़ पहाड़ी को चारों ओर से घेर लिया और अगले दिन की सुबह साढ़े 8 बजे से गोलियों की बौछार शुरू हो गई। भीलों के पास जहाँ तीर-कमान और तलवारें ही थीं, वहीं अंग्रेज आधुनिक बंदूकों एवं मशीनगनों से सज्जित थे। किवदंतियों में है कि उस दिन मानगढ़ पहाड़ी पर लगभग डेढ़ लाख जनजाती-भील एकत्रित हुए थे। उनमें से कितनों की मृत्यु हुई इसपर तो आज भी वाद-विवाद है, लेकिन इतनी बड़ी भीड़ पर जब दो-ढाई घंटों तक अंधाधुंध गोलियाँ चलाई जाएँ तो कितने लोग उसमे आहात हुए होंगे उसपर विचार करने से सब स्पष्ट हो जाएगा। 

ऑफिसियल डाक्यूमेंट्स में 1500 भीलों के मरने की बात है। जबकि, गोविंद गुरु ने यह आँकड़ा सैकड़ों में बताया था। कहा जाता है कि एक मृत माँ के शरीर से एक बच्चे को स्तनपान करते देखकर अंग्रेज कमिश्नर ने युद्ध की समाप्ति की घोषणा कर दी।  इस दौरान बहुत से भील भाग निकलने में सफल हुए जो बच गए उन्हें गोविंद गुरु एवं पूंजा पारगी के साथ बंदी बना लिया गया। सभी को अहमदाबाद की साबरमती जेल में बंद कर के राजद्रोह एवं ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध विद्रोह करने के आरोप में गोविंद गुरु एवं पूंजा पारगी के साथ-साथ 30 अन्य लोगों पर अदालती कार्यवाही कार्यवाही की गई। 

अंततः गोविंद गुरु एवं उनके अन्य दस शिष्यों को आजीवन कैद की सजा सुनाई गई। इसे बाद में कम कर के 10 वर्ष की कर दी गई। सजा के बाद गोविंद गुरु को संतरामपुर, बाँसवाड़ा, डूंगरपुर एवं कुशलगढ़ राज्य में प्रवेश करने से प्रतिबंधित कर दिया गया। अपने जीवन के अंतिम समय में गोविंद गुरु, झालोद तालुका के लिमड़ी शहर के समीप कम्बोई गांव में खेतीबाड़ी करने लगे और 30 अक्टूबर 1931 की रोज कम्बोई में ही गुरु ने अंतिम साँस भी ली। 

गोविंद गुरु और मानगढ़ हत्याकांड यहाँ के आदिवासी-भीलों एवं अन्य सनातनियों की स्मृति का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। दुःख की बात है कि इतने बड़े नरसंहार को हमारे देश के घटिया इतिहासकारों ने हमारी इतिहास की पुस्तकों में कोई स्थान ही नहीं दिया है। वामपंथी, इस्लामपंथी एवं मेकालेपंथी, उन्होंने हमेशा से ही जनजातीय-भीलों को हिन्दुओं से अलग बताने की षड्यंत्र रच है। 

यदि वे मानगढ़ का इतिहास हमारी पाठ्यपुस्तकों में शामिल कर देते तो उनका एजेंडा तो सेट ही नही होता क्योंकि सभी जान जाते कि कैसे तत्कालीन हिन्दुओं के सबसे बड़े नेता स्वामी दयानन्द सरस्वती ने, बंजारा समुदाय के गोविन्द गुरु को अपना शिष्य बनाया और कैसे एक बंजारे को आदिवासी-भीलों ने अपना गुरु, अपना भगवान मान लिया। यानी धर्म, कर्म, मातृभूमि एवं वेदों की संस्कृति बचाने के लिए सब एकसाथ एक दूसरे का हाथ पकड़कर जी रहे थे, मर रहे थे। 

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